तुम मुझमे सब कुछ खोना और मैं तुममे सब कुछ पाना सीख जाऊं ..
जब वक़्त कहीं खामोश बैठा हो ....और हम कहते रहे ...सुनते रहे ...
जब रेत पर हमारे कदम के निशाँ न बने
जब दुनिया यूँ ही रोज़ न बदलें
जब शब्द अर्थ के बंदिशों से आजाद हो
जब फूटपाथ सोना बंद करके फिर चलने लगे ...
जब हम छुट्टी में काम और काम से छुट्टी लेना बंद कर दें
जब तुम, तुम ही हो किसी तीसरे का अक्स नहीं
जब लोग मुखौटा खरीदना लगाना बन कर दें
जब राजनीती टेस्ट मैच और भ्रष्टाचार ट्वेंटी-ट्वेंटी का रवैया छोड दे
जब दिन बोझिल और रातें उदास न लगे
घर टीवी रिमोट पर न उलझे
जब लडखडाती सांसें चुपके से एक दिन ढीली न पड़ जायें
एक दिन जब कोई दिल से मुस्कुराये
या फिर सच कहने की हिम्मत ही दिखाए
जब......
जब......जब
जब की तब देखेंगे.........
:) nice :) really like the way you very easily and subtly wrap different issues into a single writing.... this one's an emotional roller coaster.... from emotions to corruption to fakeness to a hopeful yet dark future.... nice :)
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